हिन्दी कौस्तुभ – ऋतुराज विशेषांक, अप्रैल 2022

रंग बिखर रहे हैं, लोग झूम रहे हैं, महामारी का ज़ोर कम हुआ है, तो बंधन टूटे और निकल पड़ी टोलियाँ रंगो का त्यौहार मनाने। उड़ते रंगो में गुजिया का स्वाद, और आलू पापड़ का साथ, ख़ुशियाँ दुगनी कर देता है। और इस ख़ुशी के मौक़े पर विश्व हिन्दी ज्योति ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका “हिंदी कौस्तुभ” का अगला अंक “ऋतुराज विशेषांक” इस उद्देश्य के साथ प्रकाशित किया है कि इसके जरिये हम लोगों को हिंदी और उसकी महिमा से रूबरु करा सकें। यह पत्रिका हिन्दी भाषा प्रेमियों को एक मंच प्रदान करती है जहाँ वह अपनी बात अपने ढंग से कह सकते हैं। फिर चाहे वह शब्दों के माध्यम से व्यक्त करी जाए या किसी और कला के माध्यम से। हमारी भाषा हमारी पहचान है और हमें हमारी माटी से जोड़े रहती है। विश्व हिन्दी ज्योति के सभी सदस्यों ने इस प्रयास में अपना भरपूर योगदान दिया है। कृपया इस पत्रिका को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचायें और अपनी प्रतिपुष्टि अवश्य प्रदान करें। अगर आप या आपके बच्चे भी लिखते हैं तो अपनी रचनाएँ आप vihijpatrika@gmail.com पर भेज सकते हैं।

– मानसी मैहर

हिन्दी कौस्तुभ – नव-कोपल विशेषांक, जनवरी 2022

सुबह – शाम का कोहरा, अंगीठी पर सेकते हाथ, मूंगफली – गजक के ठेले और रज़ाई में दुबक के चाय की चुस्की का आनन्द, यही तो लेकर आता है सर्दी का मौसम। दिवाली से लेकर नया वर्ष और लोहड़ी से ले कर संक्रान्ति तक,  इस मौसम में आनन्द ही आनन्द है। इस आनन्द को और बढ़ाने के लिए और नए साल के उपहार के रूप में विश्व हिन्दी ज्योति ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका हिन्दी कौस्तुभ का चतुर्थ अंक प्रकाशित किया है। इस पत्रिका का उद्देश्य हिन्दी को बढ़ावा देना है। हमारी मातृभाषा हमें हमसे व हमारी माटी से जोड़े रखती है। विश्व हिन्दी ज्योति के सभी सदस्यों ने इस प्रयास में अपना भरपूर योगदान दिया है। कृपया इस पत्रिका को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचाएँ और अपने प्रतिपुष्टि अवश्य प्रदान करें। आगामी अंकों के लिए आप अपनी रचनायें भी vihijpatrika@gmail.com पर भेज सकते हैं।

– मानसी मैहर

हिन्दी कौस्तुभ – गुरु-शिष्य विशेषांक, सितम्बर २०२१

गुरु हमारे जीवन में एक विशेष स्थान रखते हैं और अनेक रूपों में आते हैं। कभी शिक्षक के रूप में तो कभी माता-पिता के रूप में, कभी बंधु बनकर तो कभी हमराही बनकर। न तो गुरु की कोई उम्र होती है न शिक्षा गृहण करने का कोई अंत। गुरु का मान करना हमारा कर्तव्य हैं और शिक्षा प्राप्त करना और सदा धर्म के रास्ते पर चलना हमारा उत्तरदायित्व। हम सबके जीवन को अनेक गुरुजनों ने हमारे वर्तमान स्वरूप में ढाला है। हमारा उन सबको शत शत नमन करते हैं।

विश्व हिन्दी ज्योति, जो हिन्दी के उत्थान में सक्रिय है, ने आज अपने गुरुजनों की याद में अपनी त्रैमासिक पत्रिका हिन्दी कौस्तुभ का तृतीय अंक प्रकाशित किया है। यह पत्रिका हिन्दी भाषा प्रेमियों को एक मंच प्रदान करती है जहाँ वो अपनी बात अपने ढंग से कह सकते हैं। हमारी भाषा हमारी पहचान है और हमें हमारी माटी से जोड़े रहती है। विश्व हिन्दी ज्योति के सभी सदस्यों ने इस प्रयास में अपना भरपूर योगदान दिया है. कृपया इस पत्रिका को ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहुँचाये और अपने प्रतिपुष्टि ज़रूर प्रदान करें। आप अपनी रचनायें vihijpatrika@gmail.com पर भेज सकते है। आगामी अंकों के लिए आप अपनी रचनायें भी vihijpatrika@gmail.com पर भेज सकते हैं।

– मानसी मैहर

हिन्दी कौस्तुभ – उड़ान विशेषांक, जून २०२१

जून का महीना, गर्मी का मौसम, आम की बहार, खिलते फूल, स्कूल की छुट्टी और, शाम को छतों पर हँसी का मेला।

काले घने बादलों की आस और धरती की प्यास, झूला झूलने की होड़ और बारात में सजने की चाह।

इतना अलबेला हैं ये गर्मी का मौसम।

जहाँ सारा विश्व महामारी से जूझ रहा है वहीं ये मौसम कुछ नयी उम्मीदें लेकर आया है। फिर से घरों के बंद दरवाज़े खुल रहे हैं और महफ़िलें सज रही हैं। इस हँसी ठिठोली के बीच हमारी विश्व हिन्दी ज्योति की त्रैमासिक पत्रिका हिन्दी कौस्तुभ का द्वितीय अंक उड़ान विशेषांक प्रकाशित हो रहा है। ये पत्रिका सिर्फ़ हमारे विश्व हिन्दी ज्योति के सदस्यों तक ही सीमित नहीं है बल्कि हर हिन्दी प्रेमी का दर्पण है। यहाँ हर कोई अपने विचारों को अपने ढंग से हिन्दी भाषा के ज़रिए पूरे विश्व में पहुँचा सकता है। विश्व हिन्दी ज्योति हमें हमारी माटी के निकट ले आती है। सम्पूर्ण विश्व में हिन्दी उत्थान की तरफ़ ये हमारा एक छोटा सा प्रयास है। कृपया इस पत्रिका को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचायें। आप पत्रिका के विषय में अपनी प्रतिक्रिया इस वेबपृष्ठ के माध्यम से या vihijpatrika@gmail.com पर भेज सकते हैं। आगामी अंकों के लिए आप अपनी रचनायें भी vihijpatrika@gmail.com पर भेज सकते हैं।

– मानसी मैहर

हिन्दी कौस्तुभ – रंग विशेषांक, मार्च २०२१

फागुन आया और चारों तरफ खुशियों के रंग बिखर गये। जहाँ दिलो में होली खेलने का उल्लास हैं, वही घरों में पकवान बनाने का जोश। रिश्तों ने अपने दरवाज़े खोल दिये और यारों की टोलियाँ निकल पड़ीं।

जहाँ चारों तरफ रंगो की धूम हैं वही विश्व हिन्दी ज्योति ने हिन्दी के उत्थान की तरफ एक और प्रयास किया है। होली के इस पावन अवसर पर विश्व हिन्दी ज्योति ने अपनी त्रैमासिक पत्रिका, हिन्दी कौस्तुभ, का प्रथम अंक, रंग विशेषांक, इस उद्देश्य के साथ प्रकाशित किया है कि इसके जरिये हम लोगों को हिन्दी और उसकी महिमा से रूबरू करा सकें। ये पत्रिका हिन्दी भाषा प्रेमियों को अपनी बात अपने ढंग से कहने का एक मंच प्रदान करती है। यहाँ वो जो चाहें कह सकते हैं, फिर चाहे वो शब्दों के माध्यम से कहा जाए या किसी और कला के माध्यम से।

हमारी भाषा हमारी पहचान है और हमें हमारी माटी से जोड़े रहती है। विश्व हिन्दी ज्योति के सभी सदस्यों ने इस प्रयास में अपना भरपूर योगदान दिया है। कृपया इस पत्रिका को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचायें और अपनी प्रतिक्रिया अवश्य प्रदान करें। आप अपनी प्रतिक्रिया इस वेब पृष्ठ के माध्यम से या vihijpatrika@gmail.com पर भेज सकते हैं। 

रंगो का त्यौहार, भूले बिसरे रिश्तों का मिलन खुशियों का साथ, हिन्दी कौस्तुभ का लोकार्पण।।

– मानसी मैहर

विश्व हिन्दी ज्योति – एक परिचय

विश्व हिन्दी ज्योति की स्थापना सन २०११ में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया प्रांत में हुई थी।

विश्व हिन्दी ज्योति अमेरिका में बसे हिन्दी प्रेमी प्रवासी भारतीयों का एक समूह है तो हिन्दी भाषा की सेवा में समर्पित है। हिन्दी साहित्य के पितामह समझे जाने वाले श्री भारतेन्दु हरिशचन्द्र कहते हैं –

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।

अर्थात् “उन्नति अपनी भाषा (मातृभाषा) में होती है, क्योंकि यह सभी उन्नतियों का मूल है। मातृभाषा के ज्ञान के बिना, हृदय के विषादों का नहीं मिटाया जा सकता है। कला, शिक्षा और विभिन्न प्रकार के ज्ञान को सभी देशों से लिया जाना चाहिए, लेकिन इसका प्रचार अपनी मातृभाषा में ही किया जाना चाहिए।”

विश्व हिन्दी ज्योति

विश्व हिन्दी ज्योति संस्था का भी यही विचार है की यदि हमें अपनी और अपनी संस्कृति की उन्नति करनी है तो हमें अपनी भाषा को ना केवल बचाना हो अपितु इसको विश्वस्तरीय भाषा बनाने की दिशा में काम करना होगा।

हम लोग हिन्दी की सेवा के लिए विभिन्न प्रकार के कार्य कर रहे हैं, जैसे निशुल्क हिंदी पाठशाला, ई-पत्रिका, मासिक गोष्ठियाँ, कवि सम्मेलन, हिन्दी की विभिन्न विधाओं पर कार्यशालाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रतियोगिताओं द्वारा जन सामान्य की हिन्दी में रुचि-वृद्धि करना इत्यादि।

हमारी संस्था सही मायनों में विश्व स्तर की संस्था है। हमारे सदस्य विश्व के विभिन्न देशों से आते हैं और हम सब मिल कर हिन्दी की उन्नति के लिए प्रयत्न करते हैं और हिन्दी का उत्सव मनाते हैं। हमारे सदस्यों का हिन्दी प्रेम मेरे लिखे इस दोहे से साफ़ विदित होता है।

हिन्दी को तो जानिए, अक्षय और अशेष।
चाहें हिन्दी को सदा, दर्जा मिले विशेष।।

अगर आप हमारे साथ इस अभियान में जुड़ना चाहते हैं तो कृपया हमें सम्पर्क करें

– मनीष कुमार श्रीवास्तव